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डिजिटल साक्षरता और AI: विकसित भारत की नई आधारशिला

Himgiri Samachar:

हम 21वीं सदी के उस निर्णायक दौर में हैं, जहाँ तकनीक केवल जीवन को सुविधाजनक नहीं बना रही, बल्कि हमारे सोचने, सीखने, काम करने और निर्णय लेने के तरीकों को भी नए सिरे से परिभाषित कर रही है। कुछ दशक पहले तक डिजिटल साक्षरता का अर्थ कंप्यूटर चलाना, इंटरनेट का उपयोग करना या ई-मेल भेजना भर था। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence–AI) ने इस अवधारणा का दायरा कहीं अधिक व्यापक बना दिया है। अब डिजिटल साक्षरता केवल तकनीक के उपयोग तक सीमित नहीं रही; इसमें तकनीक को समझना, उसकी विश्वसनीयता का मूल्यांकन करना, उसके नैतिक पक्षों को पहचानना और उसका जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करना भी शामिल है।

 

आज AI हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। मोबाइल फ़ोन का फेस अनलॉक, ऑनलाइन अनुवाद, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया की अनुशंसाएँ, नेविगेशन ऐप्स और AI चैटबॉट—इन सभी के पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव और व्यापक होगा। ऐसे में आवश्यक है कि प्रत्येक नागरिक केवल तकनीक का उपभोक्ता न बने, बल्कि उसका जागरूक, विवेकशील और उत्तरदायी उपयोगकर्ता भी बने।

 

जिस प्रकार पढ़ना-लिखना किसी समाज की प्रगति का आधार माना जाता था, उसी प्रकार आज डिजिटल साक्षरता 21वीं सदी की अनिवार्य जीवन-कौशल (Life Skill) बन चुकी है। डिजिटल रूप से साक्षर व्यक्ति बदलती अर्थव्यवस्था, शिक्षा और रोजगार के अवसरों का बेहतर लाभ उठा सकता है। इसलिए डिजिटल साक्षरता अब केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम भी है।

 

शिक्षा के क्षेत्र में AI ने अभूतपूर्व संभावनाओं के द्वार खोले हैं। विद्यार्थी अब अपनी सीखने की गति, क्षमता और आवश्यकता के अनुसार व्यक्तिगत अध्ययन सामग्री प्राप्त कर सकते हैं। भाषा संबंधी कठिनाइयों को AI आधारित अनुवाद और लेखन उपकरणों की सहायता से दूर किया जा सकता है। शोध कार्यों में विशाल मात्रा में उपलब्ध जानकारी का विश्लेषण पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज़ और प्रभावी ढंग से संभव हो गया है। दूसरी ओर, शिक्षक व्यक्तिगत शिक्षण (Personalized Learning), स्वचालित मूल्यांकन, नवाचारी शिक्षण सामग्री के निर्माण तथा विद्यार्थियों की सीखने की प्रगति के विश्लेषण में AI का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं।

 

किन्तु इस तकनीकी प्रगति के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़ा है—क्या हम AI का उपयोग कर रहे हैं, या AI हमारी सोच को प्रभावित कर रही है? यही वह बिंदु है जहाँ डिजिटल साक्षरता की वास्तविक भूमिका प्रारम्भ होती है। यदि विद्यार्थी बिना आलोचनात्मक सोच के AI द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी को अंतिम सत्य मान लें, तो उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता और स्वतंत्र चिंतन प्रभावित हो सकता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल AI का उपयोग सिखाना नहीं, बल्कि उसके साथ आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking), रचनात्मकता (Creativity) और नैतिक निर्णय क्षमता (Ethical Decision-Making) का विकास करना भी होना चाहिए।

 

आज इंटरनेट पर उपलब्ध प्रत्येक जानकारी विश्वसनीय नहीं होती। फर्जी समाचार (Fake News), डीपफेक (Deepfake), साइबर अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी, डेटा चोरी और भ्रामक ऑनलाइन सामग्री जैसी चुनौतियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। AI के विकास के साथ इन खतरों की जटिलता भी बढ़ी है। इसलिए प्रत्येक नागरिक के लिए यह जानना आवश्यक है कि किसी डिजिटल सूचना की सत्यता कैसे परखी जाए, विश्वसनीय स्रोतों की पहचान कैसे की जाए और अपनी व्यक्तिगत जानकारी को साइबर खतरों से कैसे सुरक्षित रखा जाए। डिजिटल साक्षरता का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य नागरिकों को इन चुनौतियों के प्रति जागरूक और सक्षम बनाना है।

 

AI के युग में डिजिटल नैतिकता (Digital Ethics) का महत्व भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। AI केवल तकनीकी नवाचार नहीं है; यह समाज, संस्कृति, शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी प्रभावित करती है। इसलिए इसका विकास पारदर्शिता, जवाबदेही, निष्पक्षता और मानवाधिकारों के सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। यदि तकनीक नैतिक मूल्यों से अलग होकर विकसित होगी, तो उसके दुष्परिणाम व्यापक सामाजिक असमानताओं और विश्वास के संकट के रूप में सामने आ सकते हैं। अतः डिजिटल साक्षरता का अर्थ जिम्मेदार डिजिटल नागरिकता (Responsible Digital Citizenship) का विकास भी है।

 

भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से विकसित होती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल इंडिया, UPI, आधार आधारित सेवाएँ, ई-गवर्नेंस, राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन, ऑनलाइन शिक्षा, स्मार्ट शहर, कृषि में AI तथा डिजिटल बैंकिंग जैसी पहलों ने देश के विकास को नई गति दी है। भविष्य में AI इन सभी क्षेत्रों में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यदि समाज का एक बड़ा वर्ग डिजिटल रूप से साक्षर नहीं होगा, तो तकनीकी प्रगति का लाभ सीमित लोगों तक ही सिमट जाएगा। इसलिए डिजिटल साक्षरता डिजिटल असमानता (Digital Divide) को कम करने और समावेशी विकास सुनिश्चित करने की आधारशिला है।

 

इस परिवर्तन में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान नहीं, बल्कि भविष्य की डिजिटल पीढ़ी तैयार करने वाले नवाचार केंद्र बनना होगा। AI Literacy, Digital Ethics, Cyber Security, Responsible AI, Data Privacy, Information Verification और Critical Thinking जैसे विषयों को सभी संकायों के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। चाहे विद्यार्थी साहित्य, चिकित्सा, प्रबंधन, विधि, पत्रकारिता या इंजीनियरिंग का हो—AI अब प्रत्येक क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा बनने जा रही है।

 

एक अंग्रेज़ी शिक्षिका होने के नाते मेरा दृढ़ विश्वास है कि भविष्य में भाषा और तकनीक का संबंध और अधिक गहरा होगा। प्रभावी संचार, तार्किक लेखन, आलोचनात्मक चिंतन, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिक दृष्टिकोण ऐसे मानवीय गुण हैं जिन्हें कोई भी AI पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। AI सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी अवश्य बना सकती है, लेकिन जिज्ञासा, कल्पनाशीलता, संवेदनशीलता और रचनात्मक अभिव्यक्ति आज भी मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं। इसलिए हमें विद्यार्थियों को केवल AI का उपयोग करना नहीं, बल्कि AI के साथ सोचने, प्रश्न पूछने और जिम्मेदारीपूर्वक निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।

 

यह समय केवल तकनीकी परिवर्तन का नहीं, बल्कि शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का भी है। यदि विद्यालय, विश्वविद्यालय, सरकार, उद्योग और समाज मिलकर डिजिटल साक्षरता को एक राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप दें, तो भारत उन देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सकता है जो केवल AI का उपयोग ही नहीं करते, बल्कि उसके विकास की दिशा भी निर्धारित करते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि तकनीक को मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए।

 

अंततः, डिजिटल साक्षरता का उद्देश्य केवल लोगों को डिजिटल उपकरणों का उपयोग सिखाना नहीं है। इसका वास्तविक लक्ष्य ऐसा समाज निर्मित करना है जो तकनीक को समझे, उसका विवेकपूर्ण उपयोग करे, उसके जोखिमों को पहचाने और उसके माध्यम से मानव जीवन को अधिक सुरक्षित, समावेशी और समृद्ध बनाए। AI भविष्य की सबसे प्रभावशाली तकनीकों में से एक होगी, किंतु उसका वास्तविक महत्व तभी सिद्ध होगा जब वह मानव बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता और नैतिकता के साथ संतुलित रूप से कार्य करेगी।

 

भविष्य उन्हीं राष्ट्रों का होगा जो केवल AI का विकास नहीं करेंगे, बल्कि ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो AI को समझे, उस पर प्रश्न उठाए, उसका उत्तरदायित्वपूर्वक उपयोग करे और उसे मानव कल्याण का प्रभावी साधन बनाए। विकसित भारत की दिशा में यह यात्रा डिजिटल साक्षरता से प्रारम्भ होती है, और यही उसकी सबसे सुदृढ़ आधारशिला है।

 

अक्षि कटोच पठानिया

सहायक प्रोफेसर, अंग्रेज़ी विभाग

चंडीगढ़ विश्वविद्यालय

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