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भारत की स्वास्थ्य क्रांति में AI और विश्वास की भूमिका

Himgiri Samachar:

आज मशीन लर्निंग आधारित प्रणालियाँ बीमारियों का पता लगाने, रोगियों की स्थिति का पूर्वानुमान लगाने और चिकित्सकों को निर्णय लेने में सहायता करने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर चुकी हैं। फिर भी मैंने महसूस किया कि केवल तकनीकी उत्कृष्टता पर्याप्त नहीं है। स्वास्थ्य सेवा केवल बुद्धिमान एल्गोरिद्म पर नहीं, बल्कि विश्वास पर आधारित होती है। यही विचार मेरे पीएच.डी. शोध "Trust-Enhanced Machine Learning Framework for Healthcare: A Lightweight, Interpretable, and Privacy-Preserving Approach" की मूल प्रेरणा बना।

 

 

अपने शोध के दौरान मैंने यह समझने का प्रयास किया कि अस्पताल आज भी नियमित चिकित्सा प्रक्रियाओं में एआई को अपनाने में संकोच क्यों करते हैं। साहित्य के विस्तृत अध्ययन से पाँच प्रमुख चुनौतियाँ सामने आईं—एआई द्वारा लिए गए निर्णयों की व्याख्या का अभाव, चिकित्सकों का सीमित विश्वास, रोगियों की निजी जानकारी की सुरक्षा, एल्गोरिद्म में संभावित पक्षपात तथा ऐसे जटिल मॉडल जिनका उपयोग सीमित संसाधनों वाले अस्पतालों में संभव नहीं है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐसा ढाँचा विकसित किया जिसमें Explainable AI, Federated Learning, Differential Privacy, Fairness Evaluation और Lightweight Machine Learning को एकीकृत कर भरोसे पर आधारित स्वास्थ्य एआई प्रणाली विकसित करने का प्रयास किया गया।

 

यद्यपि मेरा शोध वैज्ञानिक दृष्टि से संतोषजनक था, लेकिन मेरे मन में एक प्रश्न हमेशा बना रहा—क्या ये चुनौतियाँ वास्तव में अस्पतालों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सामने मौजूद हैं या केवल शोध-पत्रों तक सीमित हैं? इस प्रश्न का उत्तर मुझे आईआईटी गुवाहाटी में Government of Assam के सहयोग से आयोजित Advanced AI for Healthcare Innovation (AAHI) कार्यक्रम में भाग लेने के दौरान मिला। प्रारम्भ में जिसे मैंने एक सामान्य प्रशिक्षण कार्यक्रम समझा था, वही आगे चलकर मेरे शोध जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अनुभव बन गया।

 

कार्यक्रम के दौरान मुझे चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, स्टार्टअप उद्यमियों और स्वास्थ्य क्षेत्र के अनेक विशेषज्ञों के साथ संवाद करने का अवसर मिला। इन चर्चाओं ने मुझे यह एहसास कराया कि जिन समस्याओं का समाधान मैं अपने शोध में खोज रहा था, वे केवल अकादमिक विषय नहीं हैं, बल्कि अस्पतालों की प्रतिदिन की वास्तविक चुनौतियाँ हैं। बातचीत का विषय यह नहीं था कि किसी एल्गोरिद्म की सटीकता एक या दो प्रतिशत और कैसे बढ़ाई जाए। वास्तविक प्रश्न कुछ और थे—क्या डॉक्टर एआई की सलाह पर भरोसा कर सकते हैं? क्या एआई अपने निर्णय का कारण बता सकता है? क्या मरीजों का डेटा सुरक्षित रहेगा? क्या यह तकनीक सीमित संसाधनों वाले जिला अस्पतालों में भी प्रभावी ढंग से कार्य कर सकती है? मुझे महसूस हुआ कि यही वे प्रश्न थे जिन्होंने मेरे शोध की दिशा निर्धारित की थी।

 

इस कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह रही कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ तकनीक के विरोधी नहीं हैं। वे केवल बिना प्रमाण और बिना व्याख्या के किसी तकनीक पर भरोसा नहीं कर सकते। चिकित्सा में लिया गया प्रत्येक निर्णय किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़ा होता है। इसलिए चाहे कोई एआई मॉडल कितना भी सटीक क्यों न हो, यदि वह अपने निर्णय का आधार स्पष्ट नहीं कर सकता, तो चिकित्सक उस पर निर्भर नहीं हो सकते। इस अनुभव ने मेरे शोध के उस मूल विचार को और मजबूत किया कि Explainability कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि भरोसेमंद स्वास्थ्य एआई की अनिवार्य आवश्यकता है। SHAP, LIME और Grad-CAM जैसी तकनीकें, जिन्हें मैंने अपने शोध में अध्ययन किया था, अब केवल तकनीकी उपकरण नहीं रह गई थीं; वे चिकित्सकों और एआई के बीच विश्वास स्थापित करने का माध्यम बन गई थीं।

 

इसी प्रकार, इस कार्यक्रम ने डेटा गोपनीयता के महत्व को भी नए दृष्टिकोण से समझाया। मेरे शोध में Federated Learning और Differential Privacy जैसी तकनीकों को इसलिए शामिल किया गया था ताकि अस्पताल आपस में सहयोग करते हुए भी मरीजों की संवेदनशील जानकारी साझा किए बिना एआई मॉडल विकसित कर सकें। गुवाहाटी में हुई चर्चाओं ने स्पष्ट किया कि डेटा सुरक्षा केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था में जनता के विश्वास की आधारशिला है। यदि अस्पतालों को अपने डेटा की सुरक्षा पर भरोसा नहीं होगा, तो बड़े स्तर पर सहयोग और नवाचार संभव नहीं हो सकेगा।

 

असम के विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों और वहाँ की परिस्थितियों को समझने के दौरान मुझे भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की विविधता का भी अनुभव हुआ। जहाँ बड़े अस्पताल आधुनिक तकनीकी संसाधनों से लैस हैं, वहीं अनेक जिला अस्पताल और ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र आज भी सीमित कम्प्यूटिंग संसाधनों, कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी और वित्तीय चुनौतियों के बीच कार्य कर रहे हैं। अपने शोध में मैंने तर्क दिया था कि भविष्य का स्वास्थ्य एआई हल्का (Lightweight), कम संसाधनों में कार्य करने वाला तथा Edge Devices पर चलने योग्य होना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखकर यह विचार केवल सैद्धांतिक नहीं रहा, बल्कि एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गया। मैंने महसूस किया कि यदि कोई एआई प्रणाली महंगे हार्डवेयर और अत्यधिक कम्प्यूटिंग शक्ति पर निर्भर है, तो वह उन क्षेत्रों तक कभी नहीं पहुँच पाएगी जहाँ उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

 

इस पूरी यात्रा ने मुझे यह भी सिखाया कि विश्वास किसी एक एल्गोरिद्म से नहीं बनता। यह सटीकता, पारदर्शिता, व्याख्यात्मकता, निष्पक्षता, गोपनीयता, जवाबदेही और सभी तक पहुँच जैसी अनेक विशेषताओं के सामूहिक प्रयास से विकसित होता है। यही सोच मेरे शोध की आधारशिला रही है और यही विचार मुझे आईआईटी गुवाहाटी के अनुभवों से और अधिक स्पष्ट रूप से समझ आया।

 

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि AAHI कार्यक्रम मेरे शोध का विस्तार था, उससे अलग कोई अनुभव नहीं। मेरे शोध ने मुझे भरोसेमंद हेल्थकेयर AI के वैज्ञानिक सिद्धांतों को समझाया, जबकि आईआईटी गुवाहाटी और असम के स्वास्थ्य नवाचार तंत्र ने मुझे उनके वास्तविक महत्व का अनुभव कराया। इस अनुभव ने सिद्ध कर दिया कि प्रयोगशाला में तैयार किया गया शोध तभी सार्थक होता है, जब वह अस्पतालों, चिकित्सकों और समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान बन सके।

 

यदि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में Explainable AI, Federated Learning, Differential Privacy और Lightweight AI जैसे भरोसेमंद AI मॉडल व्यापक रूप से अपनाए जाते हैं, तो इसका प्रभाव केवल तकनीकी प्रगति तक सीमित नहीं रहेगा। चिकित्सकों को निर्णय लेने में अधिक विश्वसनीय सहायता मिलेगी, रोगों का समय रहते सटीक निदान संभव होगा, मरीजों के संवेदनशील डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, अस्पतालों के बीच सुरक्षित सहयोग बढ़ेगा और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों तक आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच आसान होगी। इससे स्वास्थ्य सेवाएँ अधिक पारदर्शी, सुरक्षित, किफायती और रोगी-केंद्रित बनेंगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि AI चिकित्सकों का विकल्प नहीं बनेगा, बल्कि उनका एक भरोसेमंद सहयोगी बनकर उपचार की गुणवत्ता और गति दोनों को बेहतर करेगा।

 

यह अनुभव भारत के विश्वविद्यालयों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। आज आवश्यकता केवल शोध-पत्र प्रकाशित करने की नहीं, बल्कि ऐसे अनुसंधान की है जो समाज की वास्तविक चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करे। विश्वविद्यालयों को अस्पतालों, उद्योगों, स्टार्टअप्स और सरकारी संस्थानों के साथ मिलकर बहु-विषयक (Interdisciplinary) अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा, ताकि प्रयोगशालाओं में विकसित AI समाधान सीधे स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुँच सकें। यदि हमारे उच्च शिक्षण संस्थान इस दिशा में सामूहिक प्रयास करें, तो वे केवल ज्ञान के केन्द्र नहीं रहेंगे, बल्कि स्वास्थ्य नवाचार, नीति निर्माण और आत्मनिर्भर भारत के सशक्त साझेदार बनेंगे। इससे विद्यार्थियों को वास्तविक समस्याओं पर कार्य करने का अवसर मिलेगा, शोध की गुणवत्ता बढ़ेगी और भारत भरोसेमंद तथा उत्तरदायी (Responsible) हेल्थकेयर AI के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकेगा।

 

मेरे लिए यह यात्रा केवल एक पीएच.डी. शोध या प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह इस विश्वास की यात्रा थी कि भविष्य का हेल्थकेयर AI केवल अधिक बुद्धिमान नहीं, बल्कि अधिक भरोसेमंद होना चाहिए। यदि हम ऐसी AI प्रणालियाँ विकसित कर सकें जो पारदर्शी हों, मरीजों की गोपनीयता की रक्षा करें, सीमित संसाधनों में भी कार्य करें और चिकित्सकों के निर्णयों को सशक्त बनाएँ, तो भारत न केवल अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा देगा, बल्कि विश्व के लिए भी भरोसेमंद हेल्थकेयर AI का एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करेगा। यही मेरे शोध की सबसे बड़ी प्रेरणा है और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी।

 

शौर्य वीर सिंह पठानिया

सहायक प्रोफेसर, कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग

चंडीगढ़ विश्वविद्यालय

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