शिमला, 14 जुलाई। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की साझा 422 मेगावाट क्षमता वाली किशाऊ बहुउद्देशीय जलविद्युत परियोजना को लेकर जल्द ही केंद्र सरकार और साझेदार राज्यों के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। यह एमओयू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हस्ताक्षरित किया जा सकता है। इससे पहले केंद्र सरकार ने एमओयू का मसौदा सभी साझेदार राज्यों को भेज दिया है और उन पर सुझाव मांगे हैं।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने मंगलवार को यह जानकारी दी।
इसी मसौदे की समीक्षा के लिए उन्होंने शिमला में उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में अधिकारियों के साथ एमओयू के विभिन्न प्रावधानों पर चर्चा की गई और जरूरी दिशा-निर्देश दिए गए। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को आगे बढ़ाने के पक्ष में है, लेकिन हिमाचल प्रदेश और यहां के लोगों के अधिकारों से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हाल ही में हुई बैठक में परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर सहमति बनी है। इस व्यवस्था के तहत हिमाचल प्रदेश को परियोजना में कोई पूंजी निवेश नहीं करना पड़ेगा और राज्य को हर वर्ष करीब 600 करोड़ रुपये की आय होगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने पहले के मसौदा समझौते को स्वीकार नहीं किया था और हिमाचल की ओर से रखी गई शर्तों को सभी पक्षों से मंजूरी दिलाई गई। इससे राज्य के दीर्घकालिक हित सुरक्षित हुए हैं और परियोजना के आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नए प्रावधानों के तहत सभी साझेदार राज्यों को बिजली और पानी में उनका वैध हिस्सा मिलेगा। साथ ही हिमाचल प्रदेश को अपनी जरूरत के अनुसार जलाशय से पर्याप्त पानी उपलब्ध होगा। उन्होंने बताया कि राज्य ने यमुना बेसिन में 378 मिलियन घन मीटर पानी पर अपना अधिकार भी सुनिश्चित किया है।
सुक्खू ने कहा कि वर्तमान सरकार ने हमेशा प्रदेश के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए हैं।
उन्होंने कहा कि किशाऊ परियोजना पर बनी सहमति हिमाचल के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिससे राज्य को लंबे समय तक लाभ मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) की परियोजनाओं से हिमाचल के 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के लंबे समय से लंबित बकाये को हासिल करने के प्रयास भी तेज कर रही है।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बावजूद करीब 15 वर्षों से यह मामला लंबित है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान सरकार ने किशाऊ परियोजना में राज्य के वित्तीय योगदान को लेकर आठ वर्ष से चले आ रहे गतिरोध को भी समाप्त किया है।
उन्होंने बताया कि पिछली भाजपा सरकार ने इस परियोजना में हिमाचल की हिस्सेदारी के रूप में करीब 800 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई थी। मौजूदा सरकार ने प्रदेश की वित्तीय स्थिति को देखते हुए इस प्रस्ताव का विरोध किया और बातचीत के जरिए ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की, जिसके तहत हिमाचल को परियोजना में कोई पूंजी निवेश नहीं करना होगा और राज्य अपने सभी वैध लाभ भी प्राप्त करेगा।