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ऋषि-मुनि देश की एकता के वास्तविक शिल्पकार, महर्षि अगस्त्य इसके सबसे बड़े प्रतीक : उपराष्ट्रपति

Himgiri Samachar:

नई दिल्ली, 15 जून। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि भारत की एकता के वास्तविक शिल्पकार राजा या राजनीतिक संस्थाएं नहीं, बल्कि देश के ऋषि और मुनि रहे हैं। उन्होंने कहा कि महर्षि अगस्त्य (अगत्थियार) भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक हैं।

 

उपराष्ट्रपति भवन में सोमवार को आयोजित एक समारोह में उपराष्ट्रपति ‘अगत्थियार – द यूनिफायर’ पुस्तक का विमोचन किया। पुस्तक के लेखक ओ. शमा भट और डॉ. एम. एन. सुधा हैं, जबकि इसका तमिल अनुवाद प्रोफेसर कल्याणी ने किया है। पुस्तक का प्रकाशन तमिल साहित्यिक पत्रिका ‘कलैमगल’ ने किया है।

 

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की भाषाएं एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि बहनें हैं, जिन्होंने सदियों से आपसी सम्मान और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से एक-दूसरे को समृद्ध किया है। उन्होंने कहा कि भारत की एकता कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत सच्चाई है।

 

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि तमिल भाषा से अनेक लोगों को लाभ मिला है, लेकिन तमिल के लिए जीवन समर्पित करने वाले विद्वानों को आज उचित पहचान नहीं मिल रही है। उन्होंने तमिल साहित्यकार यू. वी. स्वामीनाथ अय्यर के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने तमिल साहित्य की अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने का ऐतिहासिक कार्य किया।

 

राधाकृष्णन ने कहा कि लेखकों ने शोध के आधार पर देश के विभिन्न हिस्सों में ऋषि अगस्त्य से जुड़ी परंपराओं और संदर्भों का व्यापक संकलन किया है तथा यह पुस्तक भारत की सांस्कृतिक एकता के संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में सहायक होगी। उन्होंने कहा कि अगस्त्य उत्तर और दक्षिण भारत दोनों की परंपराओं में समान रूप से पूजनीय हैं और हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि आज जब देश की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक पहचान पर व्यापक चर्चा हो रही है, ऐसे समय में ऋषि अगस्त्य के जीवन और योगदान को याद करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

उन्होंने कहा कि ऋषि अगस्त्य केवल एक धार्मिक या पौराणिक व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में दक्षिणापथ की अवधारणा के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों को एक सांस्कृतिक सूत्र में देखा जाता था और ऋषि अगस्त्य उस परंपरा के प्रमुख वाहक रहे हैं।

 

उन्होंने कहा कि ऋषि अगस्त्य का उल्लेख साहित्य, परंपराओं और लोक स्मृतियों में व्यापक रूप से मिलता है। विशेष रूप से तमिल भाषा और व्याकरण के विकास में उनका योगदान उन्हें उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बनाता है।

 

आंबेकर ने कहा कि आज देश के लोग अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान को समझने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि लोग भगवान मुरुगन और ऋषि अगस्त्य जैसी महान परंपराओं को समझें, तो वे भारत की वास्तविक सांस्कृतिक आत्मा को बेहतर ढंग से जान सकेंगे।

 

उन्होंने अपने तमिलनाडु और दक्षिण भारत के विभिन्न मंदिरों तथा सांस्कृतिक आयोजनों के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वहां आज भी अनेक प्राचीन परंपराएं जीवंत हैं। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक कलाएं, साहित्य, मंदिर परंपराएं और सांस्कृतिक धरोहरें देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

 

आंबेकर ने पुस्तक के प्रकाशन को एक महत्वपूर्ण पहल बताते हुए इसके लेखकों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने लोगों से पुस्तक पढ़ने और ऋषि अगस्त्य के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक एकता के संदेश को समझने का आह्वान किया।

 

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