शिमला, 06 नवंबर। करीब तीन दशक से भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) की परियोजनाओं में अपने हिस्से के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हिमाचल प्रदेश को सर्वोच्च न्यायालय से बड़ी राहत मिली है। अदालत के आदेश के बाद प्रदेश को अपनी हिस्सेदारी के बदले नकद राशि के बजाय बिजली मिलेगी। इस व्यवस्था के तहत हिमाचल को हर साल करीब 600 मिलियन यूनिट यानी 60 करोड़ यूनिट बिजली मिलने का रास्ता साफ हुआ है। इससे अगले 20 वर्षों में प्रदेश को करीब 15 हजार करोड़ रुपये तक का आर्थिक लाभ होने का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक आय बिजली की बाजार कीमत पर निर्भर करेगी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस उपलब्धि को प्रदेश के अधिकारों की जीत बताया है। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी इसे हिमाचल के लिए ऐतिहासिक निर्णय बताया। वहीं, विपक्षी दल भाजपा ने इस उपलब्धि का श्रेय सभी पूर्ववर्ती सरकारों को देने की बात कही है।
1996 से लंबित था मामला, अब बिजली के रूप में मिलेगी हिस्सेदारी
हिमाचल प्रदेश के महाधिवक्ता अनूप रतन ने शुक्रवार को शिमला में बताया कि बीबीएमबी में प्रदेश की हिस्सेदारी का मामला वर्ष 1996 से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित था। अदालत ने हिमाचल को कुल 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देने के आदेश दिए हैं। इसमें पिछली अवधि का बकाया भी शामिल है। उनके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने बीबीएमबी को प्रदेश की बिजली हिस्सेदारी तत्काल प्रभाव से जारी करने के निर्देश दिए हैं।
अनूप रतन ने इस फैसले को हिमाचल के लिए दिवाली का तोहफा बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से पहले तैयार किए गए प्रस्ताव में प्रदेश को अलग-अलग दरों के आधार पर नकद भुगतान देने की व्यवस्था थी। मुख्यमंत्री सुक्खू ने इस प्रस्ताव पर अलग रुख अपनाते हुए नकद राशि के बजाय बिजली के रूप में हिस्सेदारी लेने का पक्ष रखा। सरकार का मानना था कि बिजली की बढ़ती मांग और बाजार में इसकी कीमत को देखते हुए यह व्यवस्था प्रदेश के लिए अधिक लाभदायक होगी।
अक्टूबर से मार्च के बीच मिलेगी बिजली, 800 करोड़ तक सालाना आय का अनुमान
इस व्यवस्था की खास बात यह है कि हिमाचल को अक्टूबर से मार्च के बीच बिजली मिलेगी। इन महीनों में बिजली की मांग अधिक रहती है और खुले बाजार में इसकी कीमत भी ऊंची होती है। इससे प्रदेश को अपनी हिस्सेदारी की बिजली बेचकर अधिक कमाई करने का अवसर मिलेगा।
महाधिवक्ता के अनुसार यदि बिजली की औसत कीमत 10 रुपये प्रति यूनिट रहती है तो प्रदेश को सालाना करीब 600 करोड़ रुपये की आय हो सकती है। वहीं, कीमत 13 से 14 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंचने पर यह आय 800 करोड़ रुपये या इससे अधिक हो सकती है। इस हिसाब से अगले 20 वर्षों में प्रदेश को करीब 15 हजार करोड़ रुपये तक का लाभ मिलने का अनुमान है।
मुख्यमंत्री ने बिजली की कीमत के आधार पर प्रदेश की संभावित आय 500 करोड़ से 1,000 करोड़ रुपये सालाना तक बताई है। उन्होंने कहा कि बिजली की दर छह रुपये प्रति यूनिट रहने पर भी प्रदेश को करीब 500 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। वहीं, 13 से 14 रुपये प्रति यूनिट की दर पर यह आय 1,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। उन्होंने 20 वर्षों में 20 हजार करोड़ रुपये तक के आर्थिक लाभ का अनुमान भी जताया है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर खर्च होगी अतिरिक्त आय : सुक्खू
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि बीबीएमबी से मिलने वाली अतिरिक्त आय का इस्तेमाल शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने, सड़कों और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास तथा युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने में किया जाएगा। कर्मचारियों को उनके वित्तीय लाभ समय पर उपलब्ध करवाने में भी इस राशि का उपयोग होगा। उन्होंने इसे प्रदेश की करीब 75 लाख आबादी और 24 लाख परिवारों के हितों से जुड़ी उपलब्धि बताया।
मुख्यमंत्री के अनुसार मौजूदा सरकार के कार्यकाल में वाइल्डफ्लावर हॉल, जेएसडब्ल्यू और किशाऊ बांध से जुड़े मामलों में भी हिमाचल के अधिकारों की पैरवी की गई है। सरकार शानन बिजली परियोजना और वाटर सेस के मामलों में भी अपना पक्ष मजबूती से रख रही है। उन्होंने वर्ष 2032 तक हिमाचल को देश का सबसे समृद्ध और खुशहाल राज्य बनाने का लक्ष्य दोहराया।
वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में शुरू हुई थी कानूनी लड़ाई : विक्रमादित्य
लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने प्रेस वार्ता में कहा कि बीबीएमबी में हिमाचल की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय प्रदेश के अधिकारों की बड़ी जीत है। उन्होंने कहा कि इस कानूनी संघर्ष की शुरुआत वर्ष 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में हुई थी। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत प्रदेश की हिस्सेदारी का मामला उठाया गया था। वर्ष 2011 में भी सर्वोच्च न्यायालय ने हिमाचल के हिस्सेदारी के अधिकार को स्वीकार करते हुए इसके क्रियान्वयन के निर्देश दिए थे, लेकिन बकाया ऊर्जा लाभों का निर्धारण लंबित रहा। विक्रमादित्य ने कहा कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में इस मामले में निर्णायक सफलता मिली है और इससे प्रदेश को सालाना करीब 400 से 500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ मिलने का अनुमान है।
उन्होंने कहा कि भाखड़ा-नंगल और पोंग बांध सहित ब्यास नदी पर बनी परियोजनाओं के कारण प्रदेश के कई क्षेत्रों के लोगों को विस्थापन झेलना पड़ा। अनेक परिवारों को राजस्थान और हरियाणा में बसाया गया, लेकिन उनके कई अधिकार अब भी लंबित हैं। सरकार इन परिवारों के हितों की पैरवी करेगी। चंडीगढ़ में हिमाचल की हिस्सेदारी और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े दूसरे मामलों को भी उठाया जाएगा।
सभी सरकारों ने की अधिकारों की पैरवी, श्रेय लेने से बचें मुख्यमंत्री : भाजपा
भाजपा प्रदेश मीडिया प्रभारी एवं विधायक रणधीर शर्मा ने कहा कि बीबीएमबी का मामला वर्ष 1996 से सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन था। इस दौरान प्रदेश में अलग-अलग दलों की सरकारें रहीं और सभी ने अपने कार्यकाल में हिमाचल के अधिकारों की पैरवी की। ऐसे में इस सफलता का श्रेय किसी एक सरकार को देना उचित नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री पर एकतरफा श्रेय लेने की राजनीति करने का आरोप लगाया।
रणधीर शर्मा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला प्रदेश के हित में है और इससे बिजली में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी सहित अन्य आर्थिक लाभ मिलने का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि, फैसले की विस्तृत प्रति मिलने के बाद ही इसके सभी पहलुओं की पूरी जानकारी सामने आएगी। उन्होंने वर्ष 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार के प्रयासों से हिमाचल को जलविद्युत परियोजनाओं में 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली का अधिकार मिलने का भी उल्लेख किया।