शिमला, 01 नवंबर। हिमाचल प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की प्रस्तावित पेन-डाउन हड़ताल फिलहाल टल गई है। राज्य चिकित्सा एवं दंत चिकित्सा महाविद्यालय शिक्षक संघ (सैमडिकोट) ने सरकार के साथ बातचीत और फैकल्टी के तबादला आदेश रद्द होने के बाद 2 से 4 नवंबर तक प्रस्तावित हड़ताल को दो सप्ताह के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में डॉक्टरों की कई मांगों पर सहमति बनने और सरकार की ओर से सकारात्मक आश्वासन मिलने के बाद संघ ने आंदोलन को फिलहाल रोकने का निर्णय लिया। हालांकि, संघ ने स्पष्ट किया है कि दो सप्ताह बाद सहमत मांगों पर हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी।
इससे पहले एसोसिएशन ने 28 अक्टूबर को आयोजित आपातकालीन आम सभा की बैठक में चरणबद्ध आंदोलन का ऐलान किया था। इसके तहत 2, 3 और 4 नवंबर को सुबह 9:30 से 11 बजे तक डेढ़ घंटे की पेन-डाउन हड़ताल प्रस्तावित थी। इसके बाद 5 नवंबर को सामूहिक आकस्मिक अवकाश लेकर शिमला में राज्य सचिवालय तक विरोध मार्च निकालने की योजना थी। संघ ने उस समय कहा था कि आंदोलन के दौरान आपातकालीन, ट्रॉमा और आईसीयू सेवाएं जारी रखी जाएंगी। अब सरकार के साथ बातचीत के बाद इस कार्यक्रम को दो सप्ताह के लिए टाल दिया गया है।
मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से तबादला आदेश रद्द
सैमडिकोट के अनुसार शुक्रवार शाम सात बजे सचिवालय में मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. बलबीर एस. वर्मा के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल शामिल हुआ। इस दौरान स्वास्थ्य सचिव भी मौजूद रहे। संघ ने मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताते हुए कहा कि उन्होंने चिकित्सा शिक्षकों की चिंताओं को सुना और विवाद के समाधान के लिए व्यक्तिगत स्तर पर हस्तक्षेप किया।
बैठक में मुख्यमंत्री ने उन एसोसिएट प्रोफेसरों और प्रोफेसरों के तबादला आदेश तत्काल रद्द करने के निर्देश दिए, जिन्हें अभी कार्यमुक्त नहीं किया गया था अथवा जिन्होंने तबादले के खिलाफ न्यायालय का रुख नहीं किया था। एसोसिएशन के मुताबिक इन आदेशों को औपचारिक रूप से रद्द करने की अधिसूचना शनिवार को जारी कर दी गई। संघ का कहना है कि प्रशासनिक स्तर पर मिली कुछ सलाहों के आधार पर लिए गए इन आदेशों से चिकित्सा शिक्षकों में असंतोष था। मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से इस मामले में गतिरोध दूर हुआ है।
दो महीने के चक्र में लागू होगी फैकल्टी रोटेशन नीति
बैठक में मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की तैनाती को लेकर दो महीने के चक्र वाली पारदर्शी रोटेशन नीति लागू करने पर भी सहमति बनी। यह नीति स्वीकृत और आवश्यक पदों के अनुरूप होगी। एसोसिएशन का मानना है कि इससे शिक्षकों की तैनाती और संस्थानों में उपलब्ध फैकल्टी के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बन सकेगी।
इसके अलावा प्रदेश के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में सेवा शर्तों की एकरूपता का मुद्दा भी उठाया गया। संघ के अनुसार, आईजीएमसी शिमला, एम्स चमियाना और प्रदेश के अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पदनामित सहायक प्रोफेसरों के लिए एकसमान नो वैकेशन नीति लागू करने पर सहमति बनी है। सभी नियमित सहायक प्रोफेसरों को नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस (एनपीए) देने का आश्वासन भी मिला है। इसके साथ ही सीनियर रेजिडेंट नीति में व्यापक सुधार करने की बात कही गई है, जिससे सभी मेडिकल कॉलेजों में रिक्त पदों को एम्स चमियाना की तर्ज पर भरा जा सके।
पीजी बॉन्ड नीति की भी होगी समीक्षा
एसोसिएशन ने मेडिकल कॉलेजों से पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले चिकित्सकों के भविष्य और करियर प्रोत्साहन का मुद्दा भी उठाया। बैठक में पीजी बॉन्ड नीति की समीक्षा करने पर सहमति बनी है। इसका उद्देश्य हिमाचल प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों से स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा पूरी करने वाले डॉक्टरों को प्राथमिकता और बेहतर करियर अवसर देने की व्यवस्था पर विचार करना है।
इन मांगों के साथ एसोसिएशन ने आईजीएमसी शिमला और एम्स चमियाना के प्रशासनिक ढांचे को लेकर भी अपनी राय रखी। संघ का कहना है कि एम्स चमियाना प्रदेश के पहले मेडिकल कॉलेज आईजीएमसी का सुपरस्पेशियलिटी ब्लॉक है। इसका निर्माण और वित्तीय स्वीकृति भी एक स्वतंत्र अस्पताल के रूप में नहीं, बल्कि आईजीएमसी के सुपरस्पेशियलिटी ब्लॉक के तहत हुई थी। एसोसिएशन के अनुसार, एम्स चमियाना को स्वतंत्र शिक्षण संस्थान के रूप में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की मान्यता प्राप्त नहीं है और वहां की डीएम तथा एमसीएच की सीटें भी आईजीएमसी के तहत संचालित होती हैं।
इसी आधार पर संघ ने दोनों संस्थानों के लिए एकीकृत प्रशासनिक व्यवस्था की मांग की है। उसका तर्क है कि दो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं से कामकाज और विकास प्रभावित होता है। एसोसिएशन के अनुसार, इसके लिए एकल प्रशासनिक ढांचा बनाया जाना चाहिए, जिसमें निदेशक अथवा आईजीएमसी के समन्वय से काम करने वाला उप-प्राचार्य जैसी व्यवस्था हो।
एनएमसी के नियमों को अनिवार्य मानने की मांग
एसोसिएशन ने चिकित्सा शिक्षा के नियमन में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के दिशानिर्देशों को लेकर भी स्पष्टता की मांग की है। संघ ने कुछ प्रशासनिक हलकों में दिए जा रहे इस तर्क पर आपत्ति जताई है कि स्वास्थ्य राज्य का विषय होने के कारण एनएमसी के नियम अनिवार्य नहीं हैं। एसोसिएशन का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं का प्रशासन राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन उच्च और व्यावसायिक चिकित्सा शिक्षा के मानक संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 66 और समवर्ती सूची के प्रावधानों के तहत निर्धारित होते हैं। इसलिए एनएमसी के वैधानिक नियमों का पालन जरूरी है।
संघ ने चेतावनी दी है कि इन मानकों की अनदेखी से प्रदेश में एमबीबीएस, एमडी-एमएस और सुपरस्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों की सीटों की मान्यता पर असर पड़ सकता है। एसोसिएशन के मुताबिक, इन संस्थागत मुद्दों पर भी सरकार को नीतिगत स्तर पर निर्णय लेना चाहिए।
दो सप्ताह बाद आंदोलन पर फिर लेगा निर्णय
एसएएमडीसीओटी ने कहा है कि मुख्यमंत्री के सकारात्मक हस्तक्षेप और तबादला आदेश रद्द होने के बाद 2 से 4 नवंबर तक प्रस्तावित पेन-डाउन हड़ताल को दो सप्ताह के लिए स्थगित किया गया है। इस अवधि में सरकार को सहमत मुद्दों पर आवश्यक औपचारिक अधिसूचनाएं जारी करने और उन्हें लागू करने का समय मिलेगा। दो सप्ताह बाद एसोसिएशन सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगी।